पंचक
पंचक क्या है? चंद्रमा जब धनिष्ठा के तीसरे चरण से रेवती के अंत तक (लगभग ५ दिन) रहता है, तब पंचक चलती है। इस काल में परंपरागत रूप से ये कार्य वर्जित माने जाते हैं — लकड़ी/ईंधन का संग्रह, घास-फूस या छप्पर की स्थापना, खाट/बिस्तर का निर्माण, तथा मृत-संस्कार (आवश्यकता हो तो अग्नि-दाह से पूर्व काष्ठ-पंचक पूजन कर पाँच दाह-संस्थागत चिता जलाने का विधान)। पंचक का प्रकार उसके प्रारंभ वार से निकलता है।
गण्डमूल जाँच
गण्डमूल क्या है? अश्विनी, आश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा, मूल व रेवती — ये छह नक्षत्र जल-अग्नि राशि-संधियों पर स्थित हैं। इनमें जन्म को गण्डमूल कहा जाता है; जन्म जब नक्षत्र के पहले चरण (अश्विनी-मघा-मूल) या अंतिम चरण (आश्लेषा-ज्येष्ठा-रेवती) में हो — अर्थात् सीधे गण्डांत-संधि पर — तो दोष सर्वाधिक माना जाता है। शांति प्रायः जन्म के २७वें दिन की जाती है।
आगामी गण्डमूल नक्षत्र-चंद्र
जब चंद्रमा इन छह नक्षत्रों में गोचर करता है, तब गण्डमूल शांति/स्नान आदि विधानों का समय आता है — अगली ४ अवधियाँ:
भद्रा (विष्टि करण)
भद्रा कौन? विष्टि (सातवाँ चर करण) ही भद्रा है — तिथि का आधा भाग। शास्त्र कहते हैं — “भूलोकस्था सदा त्याज्या स्वर्ग-पातालगा शुभा।” भद्रा का वास चंद्रमा की राशि से निकलता है: मेष·वृषभ·मिथुन·वृश्चिक → स्वर्ग, कन्या·तुला·धनु·मकर → पाताल (ये दोनों शुभ), और कर्क·सिंह·कुम्भ·मीन → भूलोक — केवल यही भूवासी भद्रा मांगलिक कार्यों में बाधक मानी जाती है। भद्रा-काल का अंतिम दशमांश पुच्छ कहलाता है — यह काल सदा शुभ है।
गणना लहरी अयनांश पर सन्निकट है — प्रवेश/निर्गम समय ±१-२ मिनट तक भिन्न हो सकते हैं · भद्रा-लोक व परिहार नियम मुहूर्त-संहिताओं (कश्यप संहिता आदि) अनुसार · वास्तविक मुहूर्त-निर्णय हेतु स्थानीय पंचांग/आचार्य से परामर्श करें
