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पंचक · गण्डमूल · भद्रा

अशुभ काल-सूचक — शास्त्रीय नियमों पर ब्राउज़र-गणना, बिना किसी API

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तीन लोकप्रिय सावधानी-काल — पंचक (चंद्र के पाँच नक्षत्र), गंडमूल (जन्म-नक्षत्र विशेष), और भद्रा (विष्टि करण) — उनके चालू-आगामी काल और नियम।

तिथि बदलकर आगे-पीछे की किसी भी तिथि का परिणाम देखा जा सकता है — गणना हर तिथि के वास्तविक खगोलीय आँकड़ों पर होती है, कोई स्थिर-तालिका नहीं। यह उपकरण निःशुल्क और बिना लॉगिन है; पंचक · गंडमूल · भद्रा जैसे सूट के अन्य उपकरण भी एक ही परीक्षित इंजन से चलते हैं।

पंचक · गंडमूल · भद्रा — यह कैलकुलेटर क्या करता है

गणना कैसे काम करती है

पंचक चंद्र के धनिष्ठा-शतभिषा-पूर्वाभाद्रपद-उत्तराभाद्रपद-रेवती व्याप्ति से; भद्रा विष्टि-करण (तिथि के 11 करणों में तीन) के दिन-भाग से, लोक-विभाजन (स्वर्ग/पाताल/पृथ्वी) करण-वार संयोग से।

पंचक

पंचक क्या है? चंद्रमा जब धनिष्ठा के तीसरे चरण से रेवती के अंत तक (लगभग ५ दिन) रहता है, तब पंचक चलती है। इस काल में परंपरागत रूप से ये कार्य वर्जित माने जाते हैं — लकड़ी/ईंधन का संग्रह, घास-फूस या छप्पर की स्थापना, खाट/बिस्तर का निर्माण, तथा मृत-संस्कार (आवश्यकता हो तो अग्नि-दाह से पूर्व काष्ठ-पंचक पूजन कर पाँच दाह-संस्थागत चिता जलाने का विधान)। पंचक का प्रकार उसके प्रारंभ वार से निकलता है।

गण्डमूल जाँच

गण्डमूल क्या है? अश्विनी, आश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा, मूल व रेवती — ये छह नक्षत्र जल-अग्नि राशि-संधियों पर स्थित हैं। इनमें जन्म को गण्डमूल कहा जाता है; जन्म जब नक्षत्र के पहले चरण (अश्विनी-मघा-मूल) या अंतिम चरण (आश्लेषा-ज्येष्ठा-रेवती) में हो — अर्थात् सीधे गण्डांत-संधि पर — तो दोष सर्वाधिक माना जाता है। शांति प्रायः जन्म के २७वें दिन की जाती है।

आगामी गण्डमूल नक्षत्र-चंद्र

जब चंद्रमा इन छह नक्षत्रों में गोचर करता है, तब गण्डमूल शांति/स्नान आदि विधानों का समय आता है — अगली ४ अवधियाँ:

भद्रा (विष्टि करण)

भद्रा कौन? विष्टि (सातवाँ चर करण) ही भद्रा है — तिथि का आधा भाग। शास्त्र कहते हैं — “भूलोकस्था सदा त्याज्या स्वर्ग-पातालगा शुभा।” भद्रा का वास चंद्रमा की राशि से निकलता है: मेष·वृषभ·मिथुन·वृश्चिक → स्वर्ग, कन्या·तुला·धनु·मकर → पाताल (ये दोनों शुभ), और कर्क·सिंह·कुम्भ·मीन → भूलोक — केवल यही भूवासी भद्रा मांगलिक कार्यों में बाधक मानी जाती है। भद्रा-काल का अंतिम दशमांश पुच्छ कहलाता है — यह काल सदा शुभ है।

गणना लहरी अयनांश पर सन्निकट है — प्रवेश/निर्गम समय ±१-२ मिनट तक भिन्न हो सकते हैं · भद्रा-लोक व परिहार नियम मुहूर्त-संहिताओं (कश्यप संहिता आदि) अनुसार · वास्तविक मुहूर्त-निर्णय हेतु स्थानीय पंचांग/आचार्य से परामर्श करें

परिणाम कैसे समझें

पंचक में चार कार्य परंपरागत रूप से टाले जाते हैं (काठ, मृत-संस्कार आदि के विशेष नियम); गंडमूल जन्म-समय की बात है — जन्म हुआ हो तो जन्म-नक्षत्र देखें; भद्रा में यात्रा-कार्यारंभ टालने की परंपरा।

ये मान कैसे निकलते हैं

करण-गणित व नक्षत्र-नियम शास्त्रीय — विधि विवरण।

पंचक, गंडमूल और भद्रा — जानकारी

पंचक वह अवधि है जब चंद्रमा धनिष्ठा के चौथे चरण से रेवती के तीसरे चरण तक चलता है — इसमें पाँच कार्य (छत, जुआ, यात्रा दक्षिण दिशा, ईंधन इकट्ठा, मृत-संस्कार) वर्जित माने जाते हैं।

गंडमूल नक्षत्र — अश्विनी, अश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा, मूल, रेवती — इनमें जन्म लेने पर नवजात के लिए गंडमूल-शांति का विधान होता है। भद्रा (विष्टि) करण में शुभ कार्य टाले जाते हैं। तीनों के समय यहाँ पूरे वर्ष के दिए गए हैं।

पंचक — जन्म और मृत्यु, दोनों में नियम

पंचक का चर्चा दो जगह होती है। मृत्यु-पंचक — रोहिणी, मृगशिरा, मघा, पूनर्वसु, उत्तराषाढ़ (पाँच नक्षत्र) में मृत्यु होने पर पंचक-शांति का विधान — चिता, लकड़ी, तिल-दान आदि की गणना परंपरा में स्पष्ट है। जन्म-पंचक — जन्म के समय चंद्रमा इन्हीं नक्षत्रों में हो तो शिशु-कल्याण हेतु शांति-विधान; कुछ परंपराएँ इसे उतना कठोर नहीं मानतीं। दोनों ही स्थितियों में विधान "भय" नहीं, "शांति-कर्म" का है — परंपरा का उद्देश्य चिंता नहीं, विधि-विधान रहा है।

पंचक-अवधि में छत-ढलाई, लकड़ी-क्रय, शय्या-निर्माण जैसे काम रोके जाते हैं — पाँच तिथियों की यह अवधि रोज़ एक नक्षत्र बदलकर चलती है, और अंतिम नक्षत्र (उत्तराषाढ़) की अवधि सबसे लंबी।

गंडमूल — 27 नक्षत्रों में से केवल छह

गंडमूल की चर्चा में अक्सर भ्रम होता है — सब नक्षत्र दोषी नहीं होते। शास्त्रीय दृष्टि में अश्विनी, अश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा, मूल, रेवती — इन छह नक्षत्रों के गंडांत-पदों (नक्षत्र-सीमा के निकट के पद) को गंडमूल कहा जाता है; लोक-प्रचलन इन छह नक्षत्रों के पूरे को गिन देता है। अंतर यही है — शास्त्र केवल सीमा-पद पर बल देते हैं, प्रचलन पूरे नक्षत्र पर। हमारी गणना दोनों दृष्टियाँ दिखाती है — जन्म-पद शास्त्रीय गंडांत-पद में है या नहीं, और प्रचलन-दृष्टि से क्या स्थिति है। गंडांत की गणना चंद्र की अंश-स्थिति से होती है — जन्म-समय भी यहाँ मायने रखता है, इसीलिए रिपोर्ट में जन्म-समय आवश्यक है।

सामान्य प्रश्न

पंचक में क्या नहीं करना चाहिए?
छत डलवाना, लकड़ी-ईंधन इकट्ठा करना, दक्षिण दिशा की यात्रा, जुआ और मृत-संस्कार के अलावा अन्य शुभ कार्य प्रायः किए जा सकते हैं; विशेष रूप से उपरोक्त पाँच कार्य टाले जाते हैं।
गंडमूल-शांति कब करानी चाहिए?
जन्म के 27वें दिन से पहले — अधिकांश परंपराओं में 27वें दिन नाम-करण के साथ गंडमूल-शांति कराई जाती है। पूरा नक्षत्र-चक्र पूरा होने पर शांति संपन्न होती है।
भद्रा करण क्या है?
विष्टि करण को भद्रा कहा जाता है — शकुनि, चतुष्पद, नाग, किंस्तुघ्न, बालव, तैतिल और वनिज करणों के संयोग पर भद्रा का नियम बनता है। भद्रा के काल में विवाह, मुंडन जैसे शुभ कार्य नहीं किए जाते।