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व्रत कैलेंडर

एकादशी · प्रदोष · संकष्टी · पूर्णिमा-अमावस्या — परण एवं पारण-समय सहित

पंचांग त्योहार आज का व्रत पंचक-गंडमूल मुहूर्त हिंदू कैलेंडर

एकादशी, प्रदोष, संकष्टी चतुर्थी, पूर्णिमा-अमावस्या — पूरे वर्ष के व्रत और उनका पारण-समय, आपके नगर के सूर्योदय-आधारित तिथियों से। व्रत-पारण में तो समय ही सब है।

तिथि बदलकर आगे-पीछे की किसी भी तिथि का परिणाम देखा जा सकता है — गणना हर तिथि के वास्तविक खगोलीय आँकड़ों पर होती है, कोई स्थिर-तालिका नहीं। यह उपकरण निःशुल्क और बिना लॉगिन है; व्रत कैलेंडर जैसे सूट के अन्य उपकरण भी एक ही परीक्षित इंजन से चलते हैं।

व्रत कैलेंडर — यह कैलकुलेटर क्या करता है

गणना कैसे काम करती है

तिथि-शृंखला वास्तविक चंद्र-गति से गिनी जाती है: एकादशी = 11वीं तिथि (दोनों पक्ष), प्रदोष = त्रयोदशी + संध्या, संकष्टी = कृष्ण चतुर्थी + चंद्रोदय। पारण द्वादशी-सूर्योदय के बाद की खिड़की से — स्मार्त विधान।

व्रत-दिवस का निर्धारण सूर्योदय-व्याप्त तिथि से · पारण = हरिवासर (द्वादशी का प्रथम चतुर्थांश) समाप्ति के पश्चात्, द्वादशी समाप्ति से पूर्व · संकष्टी चंद्रोदय स्थानीय सूर्यास्त के पश्चात् प्रथम चंद्रोदय

परिणाम कैसे समझें

व्रत के दिन की तिथि सूर्योदय-समयानुसार लें; पारण खिड़की के भीतर ही करें। वैष्णव परंपरा कभी-कभी एक दिन भिन्न रखती है — उस स्थिति में अपनी परंपरा देखें।

ये मान कैसे निकलते हैं

तिथियाँ खगोलीय, व्रत-विधान स्मार्त परंपरा से — विधि विवरण।

व्रत, एकादशी और पारण समय

एकादशी, प्रदोष, संक्रांति, अमावस्या और पूर्णिमा — वैदिक व्रत-पर्व चंद्रमा की गति से बँटे होते हैं। व्रत का वास्तविक महत्व उसके पारण (समापन) समय में है — पारण के बिना व्रत अधूरा माना जाता है।

इस कैलेंडर में वर्ष-भर के व्रत, उनकी तिथियाँ और हर एकादशी का नाम व पारण समय दिए गए हैं। पारण की गणना आपके शहर के सूर्योदय-सूर्यास्त के अनुसार होती है, इसलिए शहर चुनना आवश्यक है।

एकादशी व्रत — दिन, पारण और नियम

एकादशी का व्रत उस दिन करें जिस दिन सूर्योदय के समय एकादशी तिथि हो। व्रत के अगले दिन द्वादशी के प्रथम चतुर्थांश (हरिवासर) समाप्त होने पर, द्वादशी समाप्त होने से पहले पारण करें। पारण से पहले अन्न-त्याग पूर्ण रहे — यही व्रत का पूर्णता-बिंदु है। यदि द्वादशी को हरिवासर न मिले तो पारण का नियम भिन्न हो जाता है — तालिका में प्रत्येक एकादशी के साथ पारण-विंडो स्पष्ट लिखी रहती है।

दो एकादशी एक मास में आने (अधिक-मास या तिथि-मर्ज़न) पर कौन-सी व्रत-योग्य है — यह स्मार्त/वैष्णव परंपराओं में भिन्न हो सकता है; तालिका स्मार्त प्रचलन अनुसार है, और आवश्यकता हो तो अपनी परंपरा से मिला लें।

प्रदोष, संकष्टी चतुर्थी और मासिक व्रतों का क्रम

मास में दो प्रदोष व्रत — त्रयोदशी को सूर्यास्त के बाद रात्रि-पूजा के साथ। दो संकष्टी चतुर्थी — चतुर्थी को, चंद्रोदय के बाद सांध्य पूजा। पूर्णिमा-अमावस्या के व्रत/दान तिथि उस दिन सूर्योदय पर हो तो ही वह दिन गिना जाता है। इन सबका आधार एक ही है — तिथि की व्याप्ति सूर्योदय पर। इसीलिए एक ही तिथि किसी शहर में अमावस्या-वाले दिन और दूसरे शहर में अगले दिन गिनी जा सकती है। तालिका हर व्रत के साथ उसका पालन-दिन और (जहाँ लागू हो) पारण/चंद्रोदय-समय देकर यह सारा गणित आपस में मिलाकर दिखाती है।

सामान्य प्रश्न

एकादशी का पारण कब होता है?
पारण उस दिन के सूर्योदय के बाद होता है जिस दिन द्वादशी तिथि हो, और वह द्वादशी त्रिदिन-स्पर्श से मुक्त हो। पंचांग में यही पारण-समय लिखा जाता है — इसी पेज पर दिखाया भी जाता है।
एकादशी व्रत में क्या खाएँ / न खाएँ?
व्रत के दिन अनाज, दाल और मेथी वर्जित हैं। फल, दूध, मखाने, शकरकंद, कच्चा केला और सेंधा नमक ग्रहण किए जा सकते हैं। पारण के बाद सामान्य भोजन किया जाता है।
व्रत किस नक्षत्र-तिथि पर टल जाता है?
यदि एकादशी तिथि दो दिनों में फैली हो तो स्मार्त परंपरा में दूसरे दिन की एकादशी व्रत के लिए ली जाती है। परंपरा के अनुसार अपने कुल-पंचांग से विवेक करें — यहाँ द्रिग्गणित-आधारित तिथियाँ दी गई हैं।