आने वाले वर्षों के सूर्य-चंद्र ग्रहण — प्रकार, भारत से दृश्यता और स्पर्श-मध्य-मोक्ष के सटीक समय। ग्रहण-गणना खगोल-गणित की सर्वाधिक सटीक शाखा है।
तिथि बदलकर आगे-पीछे की किसी भी तिथि का परिणाम देखा जा सकता है — गणना हर तिथि के वास्तविक खगोलीय आँकड़ों पर होती है, कोई स्थिर-तालिका नहीं। यह उपकरण निःशुल्क और बिना लॉगिन है; ग्रहण कैलेंडर जैसे सूट के अन्य उपकरण भी एक ही परीक्षित इंजन से चलते हैं।
ग्रहण कैलेंडर — यह कैलकुलेटर क्या करता है
- वर्ष-वार ग्रहण — प्रकार (पूर्ण/आंशिक/खगोल-मंडल)
- भारत से दृश्यता
- स्पर्श · मध्य · मोक्ष — सटीक समय
- सूतक-विधान संदर्भ (परंपरा अनुसार)
गणना कैसे काम करती है
पात-बिंदुओं (चंद्र-पथ × सूर्य-पथ) के निकट की छाया-ज्यामिति से ग्रहण-क्षण निकलते हैं; स्पर्श-मध्य-मोक्ष सटीक-खोज से, दृश्यता दृश्य-स्थान-सुधार (topocentric) से।
गणना चंद्र अक्षांश व छाया-ज्यामिति पर आधारित सन्निकट है — परिमाण ±0.05 · मध्य-समय ±~30 मिनट · सूतक परंपरानुसार (सूर्य १२ घं., चंद्र ९ घं. पूर्व) · स्थानीय दृश्यता चयनित नगर के अनुसार
ग्रहण — प्रकार, काल और मान्यताएँ
सूर्य ग्रहण तब होता है जब चंद्रमा सूर्य और पृथ्वी के बीच आ जाए, और चंद्र ग्रहण तब जब पृथ्वी चंद्रमा पर अपनी छाया डाल दे। ग्रहण केवल अमावस्या या पूर्णिमा पर ही होते हैं, पर उन पर हमेशा नहीं — चंद्रमा की कक्षा के झुकाव के कारण।
इस कैलेंडर में आने वाले वर्षों के ग्रहण — उनका प्रकार, भारत से दृश्यता और स्पर्श-मध्य-मोक्ष का समय — दिए गए हैं। गणना परीक्षण में नासा के सार्वजनिक ग्रहण-कैटलॉग के आँकड़ों से मिलाई जाती है।
सूतक काल — क्यों और कितना?
ग्रहण के समय सूर्य-चंद्र की छाया-ज्यामिति में विशिष्ट स्थिति बनती है, और परंपरा इस अवधि को स्नान-दान-जप जैसे शुद्धि-कर्मों के लिए श्रेष्ठ तथा मंगल कार्यों के लिए वर्जित मानती है। प्रचलित नियम — चंद्र ग्रहण के पूर्व 9 घंटे, सूर्य ग्रहण के पूर्व 12 घंटे सूतक प्रारंभ। ग्रहण-समाप्ति स्नान (आमतौर पर ग्रहण-क्षण से ही) के साथ, फिर घर की शुद्धि और दान की परंपरा। बच्चे, बुज़ुर्ग और बीमार व्यक्तियों के लिए सूतक के नियम शिथिल होते हैं — परंपरा उन्हें कठोरता से बाँधती नहीं।
यह भी याद रखें — ग्रहण जो आपके शहर से दिखाई नहीं देता, उसका सूतक कई परंपराओं में लागू नहीं माना जाता। तालिका में "दृश्यता" कॉलम इसी वजह से है।
ग्रहण का वैज्ञानिक आधार और पंचांग-परंपरा
खगोलीय रूप से ग्रहण तब होता है जब सूर्य-पृथ्वी-चंद्र एक रेखा में आ जाएँ — चंद्रमा पृथ्वी की छाया में हो तो चंद्र ग्रहण, चंद्रमा सूर्य के बीच आ जाए तो सूर्य ग्रहण। इनकी भविष्यवाणी सर्वाधिक सटीक खगोल-गणित में गिनी जाती है — नासा के कैटलॉग से हमारी तालिकाएँ मिलाई जाती हैं। भारतीय परंपरा में राहु-केतु की कल्पना इसी छाया-गणित का प्रतीकात्मक रूप है — चंद्रमा की कक्षा और सूर्य-पथ के मेल-बिंदु ("पात") ही राहु-केतु कहलाए, और ग्रहण इन्हीं पातों के निकट होते हैं। पंचांग-शास्त्र की "पात-दोष" की चर्चा इसी खगोलीय तथ्य की परंपरागत अभिव्यक्ति है।
सामान्य प्रश्न
- ग्रहण में क्या करें, क्या न करें?
- परंपरा अनुसार ग्रहण-काल में मंत्र-जप और दान शुभ है; खाना बनाना, खाना और मंदिर-दर्शन टाला जाता है। ग्रहण मोक्ष के बाद स्नान कर राशि-शुद्धि का विधान है।
- सूतक काल कब से कब तक गिनें?
- ग्रहण के स्पर्श से मोक्ष तक सूतक माना जाता है; चंद्र ग्रहण में छाया-ग्रहण का भी विचार करने वाली परंपराएँ हैं। मोक्ष के बाद स्नान और मंदिर-दर्शन करने का नियम है।
- क्या हर ग्रहण भारत से दिखाई देता है?
- नहीं। ग्रहण पृथ्वी के किसी विशेष भाग से ही दिखता है। यहाँ भारत से दृश्यता भी दी गई है — जो ग्रहण दिखाई न दे, उसके सूतक का नियम अधिकांश परंपराओं में लागू नहीं माना जाता।