हिंदू (पंचांग) कैलेंडर कैसे काम करता है
हिंदू कैलेंडर चंद्र-मासों पर चलता है — चैत्र से शुरू होकर फाल्गुन पर समाप्त। हर मास में दो पक्ष — शुक्ल (बढ़ता चंद्र) और कृष्ण (घटता चंद्र) — और हर पक्ष में 15 तिथियाँ। मास का नाम उस मास में पड़ने वाली नक्षत्र-स्थिति से पड़ा है।
इस पेज पर आप किसी भी ग्रेगोरी तिथि का हिंदू रूप — विक्रम संवत्, मास, पक्ष, तिथि, नक्षत्र, योग, करण — देख सकते हैं, और उलटा हिंदू तिथि से ग्रेगोरी तिथि भी खोज सकते हैं।
हिंदू कैलेंडर की संरचना — मास, पक्ष, तिथि
हिंदू मास चाँद्र है — अमावस्या से अमावस्या तक। प्रत्येक मास के दो पक्ष — शुक्ल (अमावस्या से पूर्णिमा तक, बढ़ता चंद्र) और कृष्ण (पूर्णिमा से अमावस्या तक, घटता चंद्र)। एक पक्ष 15 तिथियों का — प्रतिपदा से चतुर्दशी, फिर पूर्णिमा/अमावस्या। यही संरचना व्रत-त्योहारों की भाषा है — "अष्टमी", "एकादशी", "चतुर्दशी" इसी पक्ष-तिथि गणना से निकलती है।
चाँद्र-मास और सौर-वर्ष में लगभग 11 दिनों का अंतर बचता है, इसलिए परंपरा हर तीसरे वर्ष अधिक-मास (मल्य-मास) जोड़ती है — यही हिंदू कैलेंडर की ऋतु-मेल की चतुराई है, जिससे त्योहार अपनी ऋतु से नहीं हटते।
अमांत-पूर्णिमांत — मास-गणना की दो परंपराएँ
उत्तर भारत की परंपरा पूर्णिमांत है — मास पूर्णिमा से समाप्त/प्रारंभ मानती है (गणेश चतुर्थी का मास भाद्रपद गिना जाता है)। दक्षिण भारत, गुजरात और कई पंचांग अमांत परंपरा चलाते हैं — मास अमावस्या से (वही गणेश चतुर्थी भाद्रपद शुक्ल पक्ष में गिनी जाती है)। दोनों में त्योहार उसी दिन पड़ते हैं — केवल नामकरण भिन्न होता है! यही कारण है कि कुछ त्योहारों का महीना उत्तर/दक्षिण भारत में "भिन्न" सुनाई देता है। इसी प्रकार एकादशी-नाम (मोक्षदा, पापमोचनी…) पूर्णिमांत-परंपरा अनुसार हैं, जो अधिकांश पंचांगों का प्रचलन है। रिपोर्ट में दोनों परंपराओं के मास-नाम साथ दिए जाते हैं, ताकि कोई भ्रम न रहे।
सामान्य प्रश्न
- विक्रम संवत् और शक संवत् में अंतर?
- विक्रम संवत् 57 ई.पू. से और शक संवत् 78 ई. से चल रहा है। अतः विक्रम संवत् शक संवत् से 135 वर्ष आगे रहता है। सरकारी पंचांगों में शक, जन-समाज में विक्रम संवत् अधिक प्रचलित है।
- हिंदू दिन कब से शुरू होता है?
- सूर्योदय से। तिथि, वार, नक्षत्र — सबकी गणना सूर्योदय आधारित है। इसीलिए रात 12 बजे नहीं, बल्कि सुबह सूर्योदय पर दिन बदलता है।
- पक्ष क्या होता है?
- पूर्णिमा से अमावस्या तक घटता चंद्रमा कृष्ण पक्ष और अमावस्या से पूर्णिमा तक बढ़ता चंद्रमा शुक्ल पक्ष कहलाता है। शुक्ल पक्ष शुभ कार्यों के लिए अधिक उत्तम माना जाता है।