Vedic AstroPack
✦  GoPixel  ✦

व्रत एवं उपवास

आज, कल और आगे के 90 दिन — हर व्रत की सूचना

आज कौन-सा व्रत है — और आने वाले 75 दिनों में क्या-क्या? यह उपकरण दैनिक व्रत-स्थिति और प्रमुख व्रतों की विधि-सूची साथ देता है।

तिथि बदलकर आगे-पीछे की किसी भी तिथि का परिणाम देखा जा सकता है — गणना हर तिथि के वास्तविक खगोलीय आँकड़ों पर होती है, कोई स्थिर-तालिका नहीं। यह उपकरण निःशुल्क और बिना लॉगिन है; व्रत · उपवास जैसे सूट के अन्य उपकरण भी एक ही परीक्षित इंजन से चलते हैं।

व्रत · उपवास — यह कैलकुलेटर क्या करता है

गणना कैसे काम करती है

आज की तिथि (नगर-सूर्योदय आधार) पर व्रत-नियम मिलाए जाते हैं — एकादशी, चतुर्थी, त्रयोदशी, अष्टमी आदि — और आगे की सूची तिथि-शृंखला से स्कैन होती है।

आज

आज का व्रत

अगले 90 दिन

आगामी व्रत-त्योहार

जानकारी

प्रमुख व्रतों की विधि

एकादशी व्रत
दशमी के दिन से एक समय (सात्विक भोजन) लें। एकादशी के दिन प्रातः स्नान कर भगवान विष्णु का पूजन करें, 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' जपें। रात्रि जागरण एवं द्वादशी के दिन ब्राह्मण/गौ/जलदान कर पारण करें। चौबीस एकादशियों में मोक्षदा, निर्जला, देवशयनी आदि विशेष फलदायी मानी गई हैं।
प्रदोष व्रत
त्रयोदशी के दिन संध्याकाल (प्रदोष काल) में शिव-पार्वती का पूजन करें। व्रती दिन भर निराहार या फलाहार रहकर प्रदोष काल में शिवलिंग पर जल-दूध-बेलपत्र अर्पित कर 'ॐ नमः शिवाय' का जप करें। सोमवार अथवा शनिवार को पड़ने पर अधिक फलदायी।
संकष्टी चतुर्थी
प्रत्येक कृष्ण चतुर्थी को गणेश जी का पूजन। सांयकाल चंद्रोदय के बाद अथवा रात्रि में दूर्वा, लज्जैत, फल अर्पित कर 'वक्रतुण्ड' मंत्र का जप करें। कठोर व्रती दिनभर निराहार रहते हैं; सामान्य व्रत में फलाहार चलता है।
अमावस्या एवं पितृ तर्पण
अमावस्या के दिन प्रातः स्नान-तर्पण करें। पितरों के नाम जल, तिल, दूध अर्पित करें। भोजन में ब्राह्मण, गौ अथवा पक्षियों को अन्न दान करें। भाद्रपद आश्विन कृष्ण पक्ष (पितृपक्ष) में श्राद्ध कर्म विशेष रूप से किए जाते हैं।
पूर्णिमा व्रत / सत्यनारायण
पूर्णिमा को स्नान-पूजन के साथ सत्यनारायण कथा का श्रवण शुभ माना जाता है। प्रसाद में पंचामृत, सूजी का हलवा व चूरे का बाँट अर्पित करें। चंद्र दर्शन कर अर्घ्य देने का विधान है।

परिणाम कैसे समझें

व्रत-विधि में स्थानीय-पारिवारिक परंपरा का स्थान होता है — यहाँ सामान्य शास्त्रीय रूपरेखा है। संदेह हो तो अपने गुरु/कुल-परंपरा से मिलाएँ।

ये मान कैसे निकलते हैं

तिथियाँ वास्तविक चंद्र-गति से — विधि विवरण।

व्रत-उपवास के प्रकार और विधि

उपवास का अर्थ है — विशेष नियम के साथ रहना। वैदिक परंपरा में व्रत शरीर की शुद्धि और मन की एकाग्रता का साधन है। एकादशी, प्रदोष, शनिवार, सोमवार, चतुर्थी, अष्टमी — विभिन्न देवताओं के व्रत नियमित रूप से आते हैं।

इस पेज पर प्रमुख व्रतों की सूची, उनकी विधि के संकेत और आगामी व्रत-तिथियाँ दी गई हैं, ताकि आप अपने ईष्ट देव के व्रत कभी न छूटें।

उपवास — अर्थ, विधि और आधुनिक व्यवहार

उपवास का अर्थ "उप (निकट) + वास (निवास)" — भगवत्-सान्निध्य में रहना। व्रत का मूल अन्न-त्याग नहीं, मन-समर्पण है; अन्न-त्याग उसका सहायक अंग है। परंपरा में कई स्तर — फलाहार, एक-सम, निराहार, और केवल जल/फल-दूध। आधुनिक जीवन में स्वास्थ्य-संगत स्तर चुनना ही शास्त्र-सम्मत है — व्रत का उद्देश्य आत्म-संयम, शरीर-नाश नहीं। बीमार, गर्भवती, बालक और बुज़ुर्गों को पूर्ण उपवास का विधान परंपरा भी शिथिल कर देती है।

पारण (व्रत-समापन) का नियम एकादशी जैसा ही है — द्वादशी के शुभ-खंड में, ब्राह्मण-भोजन/दान के साथ। प्रत्येक व्रत-पृष्ठ पर पारण-विंडो दी रहती है, जिससे व्रत पूर्ण विधि से समाप्त हो।

व्रत-चयन में तिथि की भूमिका — वार-व्रत बनाम तिथि-व्रत

व्रत दो प्रकार के हैं — वार-व्रत (सोमवार, मंगलवार, शनिवार — वार से जुड़े, तिथि से नहीं) और तिथि-व्रत (एकादशी, प्रदोष, चतुर्थी — तिथि से निर्धारित)। वार-व्रत प्रत्येक सप्ताह उसी वार को रहता है; तिथि-व्रत चाँद्र-पंचांग से चलता है, इसलिए ईसवी तारीख़ में हर महीने खिसकता है। इसीलिए "एकादशी कब है" पूछना पंचांग माँगना है, जबकि "सोमवार व्रत" स्वतः तय है। दोनों का शुभ-समय भी भिन्न — तिथि-व्रत में सूर्योदय-व्याप्ति, वार-व्रत में सूर्योदय-सूर्यास्त की प्रमुखता। यह पृष्ठ दोनों प्रकार के व्रतों की सूची और उनकी आगामी तिथियाँ एक साथ देता है — जिससे आप वार-व्रत की दिनचर्या और तिथि-व्रत के कैलेंडर, दोनों एक जगह देख सकें।

सामान्य प्रश्न

उपवास में जल ग्रहण कर सकते हैं?
निर्जला व्रत (जैसे जयंती एकादशी का नियम हो) को छोड़ अधिकांश व्रतों में जल, दूध और फल ग्रहण करना विधिसम्मत है। शरीर की क्षमता के अनुसार ही नियम रखें — शास्त्र भी सामर्थ्य देखकर व्रत कहते हैं।
व्रत टूट जाए तो क्या करें?
अचानक अशुचि या अनायास भंग होने पर मन में क्षमा माँगकर दोपहर या शाम से पुनः नियम ग्रहण करें। व्रत का मुख्य भाव भक्ति है — कठोरता से अधिक निष्ठा महत्वपूर्ण है।
बच्चों, बुज़ुर्गों और रोगियों के लिए विधान?
शास्त्रों में स्पष्ट है — जो उपवास सह न सकें, वे फलाहार ग्रहण करें और भक्ति-भाव पूर्ण रखें। स्वास्थ्य से बड़ा कोई नियम नहीं — यही वैदिक दृष्टि है।