मांगल दोष और कालसर्प — दो सर्वाधिक चर्चित किंतु सर्वाधिक भ्रांत-समझे योग। यहाँ दोनों की जाँच नियम-सहित होती है — भय नहीं, विधि दिखाई जाती है।
जन्म-विवरण बदलिए (तिथि, समय, स्थान) — परिणाम तुरंत उस जन्म-क्षण की वास्तविक खगोलीय स्थितियों के अनुसार फिर गिना जाता है। जन्म-समय जितना सटीक, लग्न व भाव उतने ही सटीक; समय अज्ञात हो तो चंद्र-आधारित विश्लेषण चुनें। यह उपकरण निःशुल्क है और दोष · कालसर्प जैसे अन्य उपकरणों के साथ एक ही परीक्षित इंजन से चलता है — आपके जन्म-विवरण किसी प्रोफ़ाइल में संग्रहित नहीं होते।
दोष · कालसर्प — यह कैलकुलेटर क्या करता है
- मांगल दोष — लग्न व चंद्र दोनों से
- रद्द-नियमों की जाँच (समान-राशि, गुरु-दृष्टि आदि)
- कालसर्प — 12 प्रकार व आंशिक-स्थिति
- प्रत्येक परिणाम में नियम-संदर्भ
गणना कैसे काम करती है
मांगल: मंगल की लग्न/चंद्र से 1,4,7,8,12 स्थिति — फिर रद्द-नियम क्रम से जाँच। कालसर्प: राहु-केतु अक्ष के एक ओर सभी ग्रह — अपवाद-ग्रह से आंशिक; अक्ष की दिशा से प्रकार-नाम।
गणना लाहिरी अयनांश से · रद्द-नियम: स्वराशि-उच्च मंगल, गुरु-दृष्टि, भाव-विशेष छूटें
दोष-जाँच कैसे पढ़ें —
मांगलिक: मंगल की स्थिति लग्न और चंद्र दोनों से देखी जाती है; 1, 4, 7, 8, 12 भाव में दोष बनता है। स्वराशि (मेष/वृश्चिक) या उच्च (मकर) का मंगल, गुरु की दृष्टि, तथा कुछ भाव-राशि संयोग दोष को रद्द कर देते हैं — ऐसा होने पर कार्ड में रद्द/शांत दिखेगा।
कालसर्प: सभी सात ग्रहों का राहु-केतु अक्ष के एक ओर होना। राहु की राशि से भेद-नाम तय होता है। एक ग्रह विपरीत ओर हो तो आंशिक कालसर्प — प्रभाव बहुत हल्का माना जाता है।
मांगलिक दोष और कालसर्प — शास्त्र क्या कहता है
मांगलिक दोष का आधार मंगल की स्थिति है। लग्न से मंगल प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम या द्वादश भाव में हो तो दोष गिना जाता है, और यही जाँच चंद्र लग्न से दोहराई जाती है। दोनों संदर्भों में दोष हो तो प्रभाव अधिक माना जाता है; इसीलिए यह पेज दोनों स्थितियाँ अलग-अलग दिखाता है।
परंपरा में दोष-रद्द के अनेक नियम प्रसिद्ध हैं। प्रमुख हैं — मंगल का अपनी राशि (मेष, वृश्चिक) या उच्च राशि (मकर) में होना; गुरु की दृष्टि मंगल पर पड़ना; चतुर्थ भाव में मेष-सिंह का मंगल; द्वादश में धनु-मीन; तथा लग्न-चंद्र से समान दूरी वाला मंगल। जिस कुंडली में ये स्थितियाँ हों, वहाँ दोष नगण्य माना जाता है — यह गणना इन्हीं नियमों को स्वतः लगाती है और लागू नियमों की सूची भी दिखाती है।
कालसर्प के 12 भेद और आंशिक कालसर्प
राहु जिस राशि में हो, योग का नाम वही बनता है — अनन्त, कुलिक, वासुकि, शंखपाल, पद्म, महापद्म, तक्षक, कर्कोटक, शंखचूड़, धनंजय, घातक और विशदत्त। शास्त्रीय दृष्टि से सभी भेद एक-समान नहीं होते; फिर भी सामान्य पाठ में योग की उपस्थिति ही मुख्य मानी जाती है। यदि एक ग्रह अक्ष के दूसरी ओर हो तो योग पूर्ण नहीं बनता — इसे आंशिक कहा जाता है और प्रभाव तुलनात्मक रूप से बहुत कम रहता है। यह पेज ग्रह-वितरण दोनों ओरों में अलग-अलग दिखाता है, जिससे आप स्वयं देख सकें कि योग कितना पूर्ण है।
सामान्य प्रश्न
- मांगलिक दोष कब लगता है?
- जब जन्म-कुंडली में मंगल लग्न, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम या द्वादश भाव में हो — लग्न और चंद्र दोनों से जाँचा जाता है। परंपरा में कई रद्द-नियम हैं, जैसे मंगल का स्वराशि-उच्च में होना या गुरु की दृष्टि; इनसे दोष रद्द या शांत माना जाता है।
- कालसर्प योग क्या है?
- जब सभी सात ग्रह राहु-केतु अक्ष के एक ओर हों तो कालसर्प योग बनता है। राहु की राशि के अनुसार इसके 12 भेद हैं — अनन्त, कुलिक, वासुकि आदि। एक ग्रह दूसरी ओर हो तो आंशिक (अर्ध) कालसर्प माना जाता है, जिसका प्रभाव हल्का होता है।
- क्या दोष दिखने पर विवाह टालना चाहिए?
- नहीं। दोष-जाँच विवाह-मिलान का केवल एक अंग है। रद्द-नियम, कुल-देवता, गुरु-परामर्श और संपूर्ण कुंडली-मिलान (अष्टकूट) भी उतना ही महत्वपूर्ण है — यह उपकरण जागरूकता के लिए है, निर्णय के लिए विद्वान से परामर्श लें।