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ज्ञान कोष

अधिक-मास — जब कैलेंडर अपना महीना जोड़ता है

चाँद्र-मास (अमावस्या से अमावस्या) औसतन 29.5 दिनों का — बारह मास 354 दिन। सौर-वर्ष (ऋतु-चक्र) 365 दिन। हर साल लगभग 11 दिनों का अंतर बचता है। यह अंतर सँभालने की पद्धति ही हिंदू कैलेंडर की सबसे चतुर व्यवस्था है — अधिक-मास (मल्य/खर्मास/पुरुषोत्तम मास)।

नियम — अधिक-मास कब आता है

चाँद्र-मास जिस अवधि में कोई सौर-संक्रांति (सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश) न हो, वह चाँद्र-मास अधिक-मास घोषित होता है। लगभग हर तीसरे वर्ष ऐसा मास आता है, और 11 दिनों का ऋण चुक जाता है। फल — त्योहार अपनी ऋतु से कभी नहीं हटते: होली हमेशा वसंत में, दिवाली हमेशा शरद में। मुस्लिम कैलेंडर जो केवल चाँद्र है, उसमें त्योहार सारे वर्ष-चक्र में घूमते हैं — अंतर समझने का सरल उदाहरण।

अधिक-मास में क्या करें

परंपरा अधिक-मास को शुभ संस्कारों (विवाह, गृह-प्रवेश, मुंडन) हेतु वर्जित मानती है, पर जप-दान-तीर्थ-स्वाध्याय हेतु विशेष श्रेष्ठ। "मल्य" (अपवित्र) कहकर भी इसे "पुरुषोत्तम" की महिमा दी गई — भगवान् विष्णु का नाम इस मास को दिया गया, जिससे "बेकार का महीना" भक्ति-अधिकार का महीना बन जाए। इसमें व्रत-उपवास, पाठ, दान का विशेष महत्व कहा जाता है।

क्षय-मास — दुर्लभ विपरीत स्थिति

कभी-कभी एक चाँद्र-मास में दो संक्रांतियाँ आ जाती हैं — तब दो चाँद्र-मास एक साथ गिने जाते हैं (क्षय-मास)। यह दशा दशकों में एक-आध बार आती है — गणना-शास्त्र की सूक्ष्मता का उत्तम उदाहरण। ऐसे वर्षों में त्योहार-क्रम पंचांग-विशेषज्ञों से मिलाना उचित रहता है।

पंचांग में अधिक-मास की पहचान

हिंदू कैलेंडर टूल में अधिक-मास स्वतः अंकित दिखता है — मास-नाम के साथ "अधिक" की टिप्पणी। व्रत-योजना बनाते समय अधिक-मास की उपस्थिति जाँच लेना उपयोगी है — विशेषकर विवाह-गृहप्रवेश जैसे संस्कारों की तिथि तय करते समय (मुहूर्त कैलेंडर इसे खिड़कियों में ही मिलाकर दिखाता है)।