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ज्ञान कोष

अयनांश — कुंडली का "शून्य-बिंदु" कैसे तय होता है

ग्रह आकाश में जहाँ हैं, वहाँ हैं — पर कुंडली बनाने के लिए "कहाँ से गिनना शुरू करें" तय करना पड़ता है। यही आधार-बिंदु अयनांश कहलाता है, और इसका चुनाव बदलने पर ग्रह की राशि एक-आध जगह खिसक जाती है। "मेरा सूर्य पश्चिमी सॉफ़्टवेयर में वृश्चिक दिखा रहा है, भारतीय पंचांग में तुला" — यह प्रश्न इसी से उपजता है, और उत्तर दोनों पक्षों में सही होता है।

दो आधार — लहरी और सायन

सायन (tropical) आधार: शून्य-बिंदु वसंत-विषुव का बिंदु (जहाँ सूर्य की आभासी पथ और विषुवत् वृत्त काटते हैं) — ऋतुओं से बँधा। पश्चिमी ज्योतिष मुख्यतः इसी पर। लहरी (sidereal) आधार: शून्य-बिंदु निश्चित तारों (चित्रा/स्पाइका) से बँधा — भारतीय परंपरा का आधार। दोनों के बीच अंतर अभी लगभग 24° है — इसीलिए ग्रह लगभग एक राशि पीछे दिखता है लहरी गणना में।

अयनांश चलता क्यों है — अयन-चलन

पृथ्वी की अक्ष-धुरी धीरे-धीरे घूमती है (टोप की तरह) — इसे अयन-चलन कहते हैं, एक चक्र लगभग 25,800 वर्ष। इसी से वसंत-विषुव का बिंदु तारों के सापेक्ष खिसकता रहता है — सायन आधार इस खिसकते बिंदु को पकड़े रहता है, लहरी तारों को। भारतीय ग्रंथों में इस चलन की गणना सदियों पहले से थी — यही "अयनांश-संस्कार" का विषय रहा।

भारतीय पंचांग किस पर चलता है

भारतीय पंचांग-परंपरा (तिथि, नक्षत्र, योग, करण, कुंडली) लहरी पर चलती है। प्रचलित अयनांश-पद्धतियों में चित्रपक्षीय लहरी (चित्रा तारे के 180° पर) सर्वाधिक मान्य है — प्रमुख पंचांग और हमारा सूट इसी पर गणना करते हैं। कुछ परंपराएँ भिन्न लहरी-मान रखती हैं — अंतर कुछ मिनट-कुछ अंश तक; इसीलिए दो पंचांगों में नक्षत्र-समापन कुछ मिनट भिन्न दिख सकता है।

व्यावहारिक निष्कर्ष

पंचांग-व्रत-मुहूर्त-कुंडली हेतु लहरी गणना ही अपनाएँ — यही भारतीय परंपरा की भाषा है। सायन गणना भी अपने संदर्भ में सही है — ऋतु-विज्ञान और पश्चिमी पद्धति की। केवल दोनों को मिलाकर पढ़ने की भूल न करें। जब कुंडली या पंचांग के मान किसी दूसरे स्रोत से मिलाएँ, तो पहले यह पूछ लें — "वह लहरी पर है या सायन?" — आधे "अंतर-प्रश्न" यहीं ही समाप्त हो जाते हैं।