एकादशी व्रत — तिथि से पारण तक पूरी विधि
एकादशी सबसे प्रसिद्ध तिथि-व्रत है — मास में दो बार (शुक्ल व कृष्ण पक्ष की एकादशी), प्रत्येक का अपना नाम (शयनी, कामदा, पुत्रदा… बारह-बारह)। व्रत की शक्ति उसकी विधि में है — दिन ठीक हो, पारण ठीक हो, तब ही व्रत पूर्ण फल देता है।
किस दिन व्रत करें — व्याप्ति-नियम
नियम वही — जिस दिन के सूर्योदय पर एकादशी तिथि चल रही हो, उसी दिन व्रत। एकादशी रात 11 बजे आरंभ होकर परसों सुबह 4 बजे समाप्त हो रही है? दोनों सूर्योदय पर एकादशी व्याप्त है — तब परंपरा दूसरे दिन को व्रत और उससे अगले दिन पारण कहती है (तिथि-व्याप्ति का प्रचलित निर्णय)। ऐसे भेदभावपूर्ण दिनों पर ही "द्वितीया-एकादशी" जैसी बातें आती हैं। हमारे व्रत कैलेंडर में यह गणना पहले से मिलाकर दी रहती है — कौन-सा दिन व्रत, कब पारण।
व्रत-दिन की दिनचर्या
व्रत-दिन का आरंभ स्नान-संकल्प से; दिन भर भगवन्नाम, पाठ, कीर्तन; रात्रि जागरण (सामर्थ्य अनुसार)। अन्न-त्याग का स्तर परंपरा में लचीला है — निराहार, फलाहार, एक-सम — सामर्थ्य और स्वास्थ्य अनुसार। व्रत का उद्देश्य आत्म-संयम और स्मरण है, शरीर-ताप नहीं; बीमार, गर्भवती, बालक-बुज़ुर्ग हेतु शिथिलता स्वयं शास्त्र देते हैं।
पारण — व्रत की समाप्ति का नियम
पारण = व्रत-भंग का शुभ-क्षण। नियम: अगले दिन द्वादशी का प्रथम चतुर्थांश (हरिवासर) समाप्त होने के बाद, द्वादशी समाप्त होने से पहले भोजन। हरिवासर "हरि का समय" है — उसमें भोजन वर्जित; उसके बाद ही पारण। अगर द्वादशी को हरिवासर ही नहीं लगा, तो नियम भिन्न — द्वादशी-व्याप्ति के अनुसार। व्रत-कैलेंडर में हर एकादशी के साथ पारण-विंडो स्पष्ट लिखी रहती है।
परंपराओं के अंतर — स्मार्त और वैष्णव
कुछ विशेष स्थितियों (अधिक-मास, क्षय-युक्त तिथियाँ) में कौन-सी एकादशी व्रत-योग्य है — स्मार्त और वैष्णव परंपराओं में निर्णय भिन्न हो सकते हैं। अधिकांश पंचांग स्मार्त-प्रचलन दिखाते हैं। अपनी परंपरा भिन्न हो तो व्रत-कैलेंडर की तिथियाँ अपने आचार्य से मिला लें — गणना एक ही रहती है, निर्णय-परंपरा भिन्न होती है।
एकादशी और अन्य व्रत — एक साथ
प्रदोष (त्रयोदशी, रात्रि-पूजा), संकष्टी चतुर्थी (चतुर्थी, चंद्रोदय-पश्चात् पूजा), पूर्णिमा-अमावस्या के दान — इन सबका आधार भी व्याप्ति-नियम ही है। व्रत-उपवास पृष्ठ पर वार-व्रत और तिथि-व्रत दोनों की सूचियाँ एक साथ दी गई हैं, ताकि मासिक व्रत-योजना एक जगह बन जाए।
