ग्रहण — विज्ञान और परंपरा, दोनों की भाषा
ग्रहण सौर-परिवार की सबसे शुद्ध गणना वाली घटना है — आज की खगोल-विज्ञान उसके मिनट-मिनट का पूर्वानुमान सदियों आगे तक दे देता है। भारतीय परंपरा ने उसी घटना को अपनी भाषा में पकड़ा — राहु-केतु, पात, सूतक। दोनों भाषाएँ एक ही तथ्य की हैं।
खगोलीय तथ्य — तीन गोलों की रेखा
सूर्य-पृथ्वी-चंद्र एक सीध में आ जाएँ तो ग्रहण — चंद्रमा पृथ्वी की छाया में हो तो चंद्र ग्रहण, चंद्रमा सूर्य और पृथ्वी के बीच आ जाए तो सूर्य ग्रहण। पर सवाल यह है कि हर पूर्णिमा-अमावस्या पर ग्रहण क्यों नहीं होता? कारण — चंद्रमा की कक्षा पृथ्वी-सूर्य के तल से लगभग 5° झुकी है। ग्रहण तभी होता है जब पूर्णिमा/अमावस्या उसी समय हो जब चंद्रमा दोनों तलों के मेल-बिंदु ("पात") के निकट हो।
राहु-केतु — पात-गणित की परंपरागत भाषा
वही दो मेल-बिंदु — जहाँ चंद्र-पथ और सूर्य-पथ काटते हैं — परंपरा में राहु (उतरता बिंदु) और केतु (उतरता-नीचे बिंदु) कहलाए। ये कोई भौतिक ग्रह नहीं, गणितीय बिंदु हैं — और कुंडली-गणना में इनका उपयोग आज भी उसी सटीकता से होता है। "ग्रहण राहु के निकट होता है" का खगोलीय अर्थ ही यह है — ग्रहण पात-बिंदुओं के निकट ही होता है। ग्रहण कैलेंडर में गणना परीक्षण में नासा के सार्वजनिक कैटलॉग के आँकड़ों से मिलाई जाती है।
सूतक — क्यों और कितना
परंपरा ग्रहण-अवधि को शुद्धि-कर्मों (स्नान, जप, दान) के लिए श्रेष्ठ और मंगल-कार्यों के लिए वर्जित मानती है। प्रचलित सूतक — चंद्र ग्रहण से पूर्व 9 घंटे, सूर्य ग्रहण से पूर्व 12 घंटे; ग्रहण-क्षण से स्नान-मंत्र, समाप्ति पर आचमन-दान। दो बातें स्पष्ट रखें — एक, जो ग्रहण आपके स्थान से दिखता नहीं, कई परंपराओं में उसका सूतक लागू नहीं (दृश्यता-नियम)। दो, बालक-बुज़ुर्ग-रोगियों हेतु कठोरता शिथिल — विधि अनुकूलन की है।
ग्रहण-देखना — वैज्ञानिक सावधानी
सूर्य ग्रहण सदैव उपयुक्त सौर-फ़िल्टर (सूर्य-चश्मा/प्रक्षेप-विधि) से देखें — नंगी आँख से नहीं। चंद्र ग्रहण नग्न नेत्र से सुरक्षित है। ग्रहण-गणना में हमारी तालिकाएँ द्रिग्गणित स्तर पर हैं — परिमाण, मध्य-समय और स्थानीय दृश्यता सहित — जिससे सूतक-निर्णय आपके अपने शहर के अनुसार हो, दिल्ली-का-नहीं।
