तिथि का गणित — त्योहार खिसकने का असली कारण
ईसवी कैलेंडर सूर्य की गति पर है, हिंदू तिथि चंद्रमा पर। इसी दो गतियों के मेल-मिलावट से वह प्रश्न उठता है जो हर घर में आता है — "इस साल दिवाली किस तारीख़ को है?" इसका उत्तर तिथि-गणित में छिपा है।
तिथि निकालने का नियम
चंद्रमा रोज़ औसतन 13°10′ से 13°30′ की दर से सूर्य से आगे बढ़ता है (गति एकसार नहीं — चंद्रमा की कक्षा दीर्घवृत्तीय है)। जब चंद्र-सूर्य कोण 0°, 12°, 24°… 348° को पार करता है, नई तिथि आरंभ होती है। प्रत्येक 12° = एक तिथि; 30 तिथियों से चाँद्र-मास पूरा।
चंद्रमा की गति भिन्न होने से तिथियों की अवधि भी घट-बढ़ती है — लगभग 19 से 26 घंटे तक। जब तिथि संक्षिप्त हो और उसका आरंभ-अंत दोनों एक ही सूर्योदय के बीच पड़ें, वह तिथि उस दिन के सूर्योदय पर व्याप्त नहीं होती — तब वह तिथि कैलेंडर से "छूट" जाती है (क्षय-तिथि)। दो तिथियाँ एक ही दिन सूर्योदय पर हों तो दोनों की गिनती एक ही दिन में होती है। इसी कारण कुछ साल में किसी त्योहार के "दो दिन या बिल्कुल नहीं" जैसी बातें सुनाई देती हैं।
व्याप्ति — तिथि "उस दिन" कब कहलाती है
नियम: जिस दिन के सूर्योदय पर जो तिथि चल रही हो, वही उस दिन की तिथि। उदाहरण — एकादशी तिथि रात 2 बजे आरंभ और अगले दिन रात 1 बजे समाप्त। पहले दिन के सूर्योदय पर एकादशी चल रही थी? नहीं — वह दशमी का दिन था। दूसरे दिन के सूर्योदय पर एकादशी है — वही एकादशी-व्रत का दिन। यही "व्याप्ति" का व्यावहारिक अर्थ है।
त्योहार शहर बदलने पर खिसकते क्यों हैं
सूर्योदय हर शहर में भिन्न समय पर होता है — पूर्व के शहर (कोलकाता, गुवाहाटी) में जल्दी, पश्चिम के (मुंबई, अहमदाबाद) में देर से — लगभग 45-50 मिनट का अंतर। अब सोचिए — तिथि सुबह 5:30 बजे समाप्त हो रही है। कोलकाता के सूर्योदय (5:05) पर वह अभी चल रही है — वहाँ वही तिथि गिनी जाएगी। मुंबई के सूर्योदय (6:35) पर वह समाप्त हो चुकी — वहाँ अगली तिथि गिनी जाएगी। वही त्योहार — दो शहरों में दो तारीख़ें। यह कोई विरोध नहीं, गणना-नियम का सही पालन है।
विदेश में तो अंतर और बड़ा
न्यूयॉर्क भारत से पूरे 9:30 घंटे पीछे है — वहाँ त्योहार प्रायः भारत से एक दिन बाद आता है; सिडनी 4:30 घंटे आगे — कई बार एक दिन पहले। नियम वही — वहाँ के सूर्योदय पर जो तिथि, वही वहाँ का त्योहार। विश्व पंचांग टूल ठीक यही गणना विदेशी शहरों के लिए करता है।
पारण — तिथि-गणना का समापन-चरण
एकादशी जैसे व्रतों में पारण (व्रत-भंग) का नियम भी तिथि-गणित से ही आता है — द्वादशी का प्रथम चतुर्थांश (हरिवासर) समाप्त होने पर, द्वादशी समाप्त होने से पहले भोजन करें। पारण-विंडो देखने हेतु व्रत कैलेंडर में हर एकादशी के साथ समय दिया रहता है।
